प्रदीप कुमार
हरिद्वार/श्रीनगर गढ़वाल।हरिद्वार जनपद के रुड़की विकासखंड के माधोपुर हजरतपुर गांव की सबनम कभी एक साधारण गृहिणी थीं। आज वे आस्था सीएलएफ के रोजा स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य और एक सफल महिला उद्यमी बन चुकी हैं। कभी जिनके पास न कोई स्थायी आय का स्रोत था,न ही व्यवसाय करने का अनुभव,वही सबनम आज अपने गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।उनके जीवन में यह बदलाव ग्रामोत्थान परियोजना (रीप) के सहयोग से आया। वर्ष 2023-24 में उन्होंने एकल कृषि उद्यम के अंतर्गत बकरी पालन व्यवसाय के लिए आवेदन किया। पूर्व में वे 2-3 बकरियों से सीमित स्तर पर पालन करती थीं,जिससे मात्र ₹15,000 से ₹20,000 की अर्धवार्षिक आय होती थी,जो परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी।ग्रामोत्थान परियोजना की सहायता से ₹3 लाख की एक व्यवसायिक योजना तैयार की गई,जिसमें ₹75,000 की अनुदान राशि,₹75,000 स्वयं का अंशदान और ₹1,50,000 बैंक ऋण शामिल था। इस वित्तीय सहयोग से उन्होंने 9-10 बकरियों की एक व्यवस्थित इकाई स्थापित की।अब सबनम इस इकाई से प्रति छः माह ₹60,000 से ₹70,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।इस आय से वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी कर रही हैं,बल्कि बच्चों की शिक्षा और घरेलू सुविधाओं को भी बेहतर बना रही हैं।सबनम की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही मार्गदर्शन,संसाधन और सहयोग मिले,तो वे आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा सकती हैं।उनकी कहानी आज न केवल माधोपुर हजरतपुर, बल्कि पूरे हरिद्वार जिले की महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है।
Spread the love
हरिद्वार की सबनम बनीं ग्रामीण उद्यमिता की मिसाल
प्रदीप कुमार
हरिद्वार/श्रीनगर गढ़वाल।हरिद्वार जनपद के रुड़की विकासखंड के माधोपुर हजरतपुर गांव की सबनम कभी एक साधारण गृहिणी थीं। आज वे आस्था सीएलएफ के रोजा स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य और एक सफल महिला उद्यमी बन चुकी हैं। कभी जिनके पास न कोई स्थायी आय का स्रोत था,न ही व्यवसाय करने का अनुभव,वही सबनम आज अपने गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।उनके जीवन में यह बदलाव ग्रामोत्थान परियोजना (रीप) के सहयोग से आया। वर्ष 2023-24 में उन्होंने एकल कृषि उद्यम के अंतर्गत बकरी पालन व्यवसाय के लिए आवेदन किया। पूर्व में वे 2-3 बकरियों से सीमित स्तर पर पालन करती थीं,जिससे मात्र ₹15,000 से ₹20,000 की अर्धवार्षिक आय होती थी,जो परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी।ग्रामोत्थान परियोजना की सहायता से ₹3 लाख की एक व्यवसायिक योजना तैयार की गई,जिसमें ₹75,000 की अनुदान राशि,₹75,000 स्वयं का अंशदान और ₹1,50,000 बैंक ऋण शामिल था। इस वित्तीय सहयोग से उन्होंने 9-10 बकरियों की एक व्यवस्थित इकाई स्थापित की।अब सबनम इस इकाई से प्रति छः माह ₹60,000 से ₹70,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।इस आय से वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी कर रही हैं,बल्कि बच्चों की शिक्षा और घरेलू सुविधाओं को भी बेहतर बना रही हैं।सबनम की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही मार्गदर्शन,संसाधन और सहयोग मिले,तो वे आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा सकती हैं।उनकी कहानी आज न केवल माधोपुर हजरतपुर, बल्कि पूरे हरिद्वार जिले की महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है।