प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल और शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से चौरास परिसर स्थित अकादमिक गतिविधि केंद्र में भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन के लिए शिक्षकों की क्षमता संवर्धन विषय पर दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ 15 अक्टूबर को हुआ। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के संकाय सदस्यों तथा अकादमिक विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री के विकास को प्रोत्साहित करना और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना है। कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.प्रकाश सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो.हरभजन सिंह चौहान विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। वहीं शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के अकादमिक समन्वयक डॉ.चंदन श्रीवास्तव ने विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रतिभागियों को संबोधित किया। कार्यक्रम की कार्यवाही में पूर्णकालिक राज्य समन्वयक उत्तराखंड प्रो.नारायण दत्त और भारतीय भाषा समिति की राज्य समन्वयक डॉ.अलका सूरी तथा अकादमिक समन्वयक डॉ.रचना विश्वकर्मा और डॉ.सुधांशु भूषण के साथ समन्वयक डॉ.आलोक सागर गौतम ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को इसकी केंद्रीय विषयवस्तु से अवगत कराया गया। इसका मुख्य उद्देश्य 22 भारतीय भाषाओं में विद्यालयी और उच्च शिक्षा के लिए संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के रूप में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री विकसित करना है। इस पहल के माध्यम से बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करने और विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री की पहुंच बढ़ाने के साथ देशभर में ज्ञान को अधिक सुलभ बनाने का प्रयास किया जाएगा।क्षअपने संबोधन में कुलपति प्रो.प्रकाश सिंह ने भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में इस पहल के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है।” पुस्तकों को अमूल्य धरोहर बताते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं में शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रयास से शिक्षा का विस्तार होगा और समाज के व्यापक वर्ग तक ज्ञान की पहुंच सुनिश्चित की जा सकेगी। कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपराओं की विविधता और उनके ऐतिहासिक विकास के साथ देश की समृद्ध बौद्धिक विरासत पर भी विचार रखे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसके पंद्रहवें अध्याय में अनुसंधान पद्धति पर चर्चा की गई है। यह प्राचीन भारतीय साहित्य में निहित ज्ञान की गहराई और समृद्धि को दर्शाता है। उन्होंने ऐसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने और उन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। अपने संबोधन के समापन पर उन्होंने कहा कि “पुस्तक लेखन राष्ट्र निर्माण है।” उन्होंने ज्ञान के सृजन और संरक्षण तथा प्रसार को राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताया। विषय विशेषज्ञ डॉ.चंदन श्रीवास्तव ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रौद्योगिकी आधारित बहुभाषी सामग्री के विकास के माध्यम से एक संपूर्ण उद्योग विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद केवल शब्दों के रूपांतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि मूल रचनाओं की अवधारणाओं और अर्थ के साथ उनकी मूल भावना भी सुरक्षित रखी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि इस पहल की घोषणा केंद्रीय बजट 2025 में की गई थी जिसके अंतर्गत 2.5 लाख पुस्तकों को विकसित करने का प्रस्ताव है। कार्यक्रम के समन्वयक डॉ.आलोक सागर गौतम ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने अपने संबोधन में उत्तराखंड में पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया और पुस्तकों के लेखन के साथ राज्य के विभिन्न शिक्षाविदों के सामूहिक सहयोग से पुस्तकों के प्रकाशन की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इस दिशा में आपसी समन्वय और सहयोग के महत्व को भी रेखांकित किया। कार्यशाला में कुल 75 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इनमें 65 संकाय सदस्य और अकादमिक पेशेवर तथा आठ शोधार्थी और दो विद्यार्थी शामिल रहे। ये प्रतिभागी उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से पहुंचे थे। प्रतिभागियों की व्यापक भागीदारी बहुभाषी शैक्षणिक संसाधनों के विकास और शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के प्रति अकादमिक समुदाय की रुचि को दर्शाती है। उद्घाटन सत्र में संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के विकास और भारतीय भाषाओं के साथ प्रौद्योगिकी के एकीकरण तथा भारत की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के व्यापक प्रसार पर सार्थक चर्चा के लिए आधार तैयार हुआ। यह कार्यशाला समावेशी और सुलभ तथा उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षणिक संसाधनों के निर्माण में योगदान देने के साथ देश की शिक्षा व्यवस्था और बौद्धिक परिदृश्य में भारतीय भाषाओं की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। कार्यक्रम का संचालन डॉ.कविता भट्ट ने किया जबकि डॉ.आलोक सागर गौतम ने कार्यक्रम के समन्वय और सुचारु संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर प्रो.आर.एस.नेगी और प्रो.सीमा धवन तथा प्रो.डी.एस.नेगी और प्रो.एम.एस.नेगी के साथ प्रो.सुरेंद्र सिंह बिष्ट तथा प्रो.बी.पी.नैथानी सहित अनेक संकाय सदस्य और शिक्षाविद् उपस्थित रहे।
