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प्रदीप कुमार
टिहरी/श्रीनगर गढ़वाल। कुछ लोग पहाड़ों को दूर से निहारते हैं तो कुछ उनकी खूबसूरती में खो जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो उन्हीं पहाड़ों की दुर्गम चोटियों को अपना लक्ष्य बना लेते हैं। टिहरी के सार्थक कुड़ियाल इन्हीं जुनूनी लोगों में से एक हैं। जिन पहाड़ों को देखकर लोग उनकी विशालता और कठिनाइयों का अंदाजा लगाते हैं सार्थक ने उन्हीं पहाड़ों को अपने सपनों की मंजिल बनाया। संकल्प साहस और अदम्य इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने 6137 मीटर ऊंची हिमालय की बेहद चुनौतीपूर्ण श्रीकंठ चोटी का सफल आरोहण कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस उपलब्धि के साथ वे दुनिया के सबसे युवा श्रीकंठ पर्वतारोही बने हैं। उनकी इस सफलता ने न केवल टिहरी गढ़वाल बल्कि पूरे उत्तराखंड को गौरवान्वित किया है। जनपद टिहरी गढ़वाल के विकासखंड प्रतापनगर के ग्राम शुक्री निवासी सार्थक कुड़ियाल का जन्म अगस्त 2001 में नई टिहरी में हुआ। उनके पिता रमेश कुड़ियाल पेशे से पत्रकार हैं जबकि माता सरिता कुड़ियाल समाजसेविका हैं। वे पूर्व में भारत सरकार की महत्वपूर्ण परियोजना महिला समाख्या में जिला समन्वयक के पद पर भी कार्य कर चुकी हैं। सार्थक की प्रारंभिक शिक्षा ऑल सेंट्स कॉन्वेंट स्कूल एवं केंद्रीय विद्यालय नई टिहरी में हुई। इसके बाद उन्होंने देहरादून से आगे की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा के साथ-साथ प्रकृति और पहाड़ों के प्रति उनका आकर्षण गहराता गया। धीरे-धीरे यही आकर्षण उनके जीवन का उद्देश्य बन गया और पर्वतारोहण उनका करियर बन गया। पर्वतारोहण केवल शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन नहीं बल्कि मानसिक दृढ़ता अनुशासन तकनीकी दक्षता और विपरीत परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता का भी कठिन परीक्षण है। इस चुनौती को समझते हुए सार्थक ने अपने हुनर को व्यवस्थित प्रशिक्षण के जरिए निखारा। उन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान निम उत्तरकाशी से बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स सर्च एंड रेस्क्यू कोर्स तथा एमओआई कोर्स किया। इसके अतिरिक्त मनाली स्थित अभिमास से एडवांस माउंटेनियरिंग कोर्स भी पूरा किया। प्रशिक्षण और निरंतर अभ्यास के जरिए उन्होंने पर्वतारोहण की तकनीकी बारीकियां सीखीं और कई चुनौतीपूर्ण चोटियों पर सफल आरोहण कर अपने अनुभव को विस्तार दिया। समुद्र तल से 6137 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्रीकंठ चोटी को तकनीकी दृष्टि से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यहां तक पहुंचने का रास्ता केवल ऊंचाई की चुनौती नहीं बल्कि पर्वतारोहियों के धैर्य कौशल और शारीरिक क्षमता की भी परीक्षा लेता है। कम ऑक्सीजन खड़ी ढलानें और प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां इस अभियान को और कठिन बना देती हैं। बताया जाता है कि अब तक इस चोटी पर केवल चार पर्वतारोहण दल ही सफलतापूर्वक आरोहण कर पाए हैं। ऐसे में सार्थक की सफलता पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष 2022-23 में प्रायोजित श्रीकंठ चोटी पर्वतारोहण अभियान के लिए भी सार्थक का चयन हुआ था। अभियान में सफलता के बाद उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया था। सार्थक के लिए पर्वतारोहण महज किसी ऊंची चोटी को फतह करने का रोमांच नहीं है। यह पहाड़ों को करीब से जानने प्रकृति के विस्तार को महसूस करने और मानव जीवन तथा प्रकृति के बीच गहरे संबंध को समझने का माध्यम है। पर्वतारोहण के साथ-साथ उन्होंने जल क्रीड़ा के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया है। प्रकृति के प्रति उनका लगाव और पहाड़ों के प्रति समर्पण उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान है। सार्थक कहते हैं कि पहाड़ उनके लिए केवल पहाड़ नहीं हैं बल्कि उनका जीवन हैं। वे हर ऊंचे से ऊंचे पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर एक और पहाड़ देखना चाहते हैं। उनके लिए पर्वतारोहण किसी चोटी को फतह करने तक सीमित नहीं है बल्कि पहाड़ों के विस्तार प्रकृति में उनके महत्व और मानव जीवन के साथ उनके अंतरसंबंध को समझने का एक माध्यम है। उनका मानना है कि किसी ऊंची चोटी पर पहुंचकर दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल जाता है। उनके इस विचार में पर्वतारोहण के प्रति उनका जुनून ही नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता भी झलकती है। सार्थक की यह उपलब्धि बताती है कि पहाड़ों की कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े युवाओं के सपने भी हिमालय की चोटियों की तरह ऊंचे हो सकते हैं। जरूरत है तो केवल अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण निरंतर अभ्यास और चुनौतियों से जूझने के साहस की। सार्थक के लिए श्रीकंठ चोटी का आरोहण कोई अंतिम पड़ाव नहीं बल्कि हिमालय की अनगिनत ऊंचाइयों की ओर बढ़ते सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पहाड़ों को अपना पहला प्रेम और जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने वाले सार्थक की यह सफलता नई पीढ़ी के युवाओं को अपने सपनों को पहचानने उन्हें लक्ष्य में बदलने और पूरे समर्पण के साथ हासिल करने की प्रेरणा देती है। कहते हैं कि शिखर पर पहुंचने वाले कदमों के पीछे वर्षों का अभ्यास और अनगिनत संघर्ष छिपे होते हैं। सार्थक कुड़ियाल की कहानी भी इसी जुनून समर्पण और हौसले की कहानी है जिसने टिहरी की धरती से निकलकर हिमालय की ऊंचाइयों पर अपनी पहचान बनाई है।

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