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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर एक शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किया गया।कार्यक्रम में समन्वयक डॉ.अमरजीत परिहार ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल एक स्वतंत्र विषय के रूप में न देखकर सभी शैक्षणिक विषयों के साथ समन्वित रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह परम्परा अनुभव अवलोकन और प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित है इसलिए इसे शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करना समय की आवश्यकता है। कार्यक्रम में वक्ताओं का स्वागत करते हुए एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो.डी.एस नेगी ने बताया कि विश्वविद्यालय में संचालित प्रत्येक विषय से संबंधित भारतीय ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता प्रो मोहन पंवार ने वेदों में निहित भौगोलिक ज्ञान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद में नदियों और पर्वतों का विस्तृत वर्णन मिलता है जबकि पृथ्वी सूक्त में जलवायु वातावरण ग्रहण और भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाओं का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि संहिता काल और उपनिषद काल में भी भूगोल संबंधी चिंतन विकसित रूप में उपस्थित था। भारतीय ज्ञान परम्परा को विश्व की प्राचीनतम ज्ञान प्रणालियों में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र में समृद्ध ज्ञान परम्परा निहित है जिसकी आधुनिक समय में विशेष प्रासंगिकता है। इस अवसर पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हरिपुर हिमाचल के डॉ.दिनेश कुमार शर्मा ने कृषि आधारित भारतीय ज्ञान परम्परा पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं रही बल्कि यह प्रकृति के साथ संतुलित जीवन पद्धति का आधार भी रही है। कार्यक्रम का संचालन डॉ विकास चौबे और शोधार्थी अपराजिता घिल्डियाल ने संयुक्त रूप से किया।

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