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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षा और भौतिकी विभाग द्वारा आयोजित आईसीएसएसआर प्रायोजित दस दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ शिक्षाविदों शोधार्थियों और प्रतिभागियों की सक्रिय उपस्थिति के साथ हुआ। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणाली और शोध पद्धति के समन्वय के माध्यम से शिक्षकों एवं शोधार्थियों को सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दृष्टि से सशक्त बनाना है। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए शिक्षा शोध नवाचार और नैतिकता के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो.प्रकाश सिंह ने अपने संबोधन में यूजीसी की दिशानिर्देशों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रत्येक शोधार्थी के लिए इन दिशा-निर्देशों का पालन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शोध कार्य केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक जिम्मेदार प्रक्रिया है जिसमें ईमानदारी और अनुशासन सर्वोपरि हैं। उन्होंने शोधार्थियों को सलाह दी कि वे यूजीसी के दिशा-निर्देशों को गंभीरता से पढ़ें और उन्हें अपने शैक्षणिक कार्यों में लागू करें। प्रो.सिंह ने आगे कहा कि एक शोधार्थी को अपने कार्य को प्राथमिकता देते हुए लेखन अध्ययन और अकादमिक गतिविधियों के प्रति पूर्णतः समर्पित रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शोधार्थियों को अपने सुपरवाइज़र के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी निभानी चाहिए जितनी वे अपने शोध कार्य के प्रति निभाते हैं। उदाहरण के रूप में उन्होंने अपने एक शोधार्थी का उल्लेख किया जो किसी भी शैक्षणिक या व्यक्तिगत कार्य के लिए पूर्व अनुमति लेकर ही आगे बढ़ता है जो अनुशासन और उत्तरदायित्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने शोधार्थियों को बाहरी राजनीति अनावश्यक चर्चाओं और ध्यान भटकाने वाली गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी। उनका मुख्य उद्देश्य अपने शोध कार्य को समय पर पूरा करना और समाज के लिए उपयोगी ज्ञान या आविष्कार प्रस्तुत करना होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शोधार्थी अपने कार्य के माध्यम से न केवल अच्छे विद्वान बनें बल्कि समाज के लिए प्रेरणादायक शिक्षक भी बनें जिससे देश की प्रगति और सुदृढ़ता में योगदान मिल सके। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि शोधार्थियों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना चाहिए और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो.पी.वी.बी.सुब्रमण्यम निदेशक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग ने भारतीय ज्ञान प्रणाली की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रणाली गुरु-शिष्य परंपरा अनुभवजन्य शिक्षा और समग्र विकास के सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं है बल्कि यह विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी विकसित करती है। उन्होंने शोध पद्धति कार्यशालाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को यह समझने में मदद करते हैं कि वे अपने अध्यापन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कैसे जोड़ सकते हैं। निदेशक चौरास परिसर प्रो.राजेन्द्र सिंह नेगी ने विश्वविद्यालय परिसर की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परिसर का प्रत्येक भाग विश्वविद्यालय की दिशानिर्देशों के अनुरूप विकसित किया गया है और यहां का अनुशासित एवं शैक्षणिक वातावरण प्रतिभागियों को प्रेरित करता है। उन्होंने कुलपति के दूरदर्शी नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि उनके विजन के कारण विश्वविद्यालय की गरिमा हरियाली और संग्रहालय संरक्षित एवं विकसित हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि यह परिसर शिक्षा और अनुसंधान के लिए एक आदर्श स्थान है जहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संतुलन देखा जा सकता है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल (आरडीसी) निदेशक प्रो.हेमवती नंदन ने अपने औपचारिक वक्तव्य में शिक्षा और विज्ञान में नवाचार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नवाचार केवल सैद्धांतिक लेखन तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि इसे व्यावहारिक रूप में लागू करना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा और शोध तभी सार्थक होंगे जब उनके परिणाम समाज और विद्यार्थियों के जीवन में प्रत्यक्ष प्रभाव डालें।कार्यक्रम में डीन रिक्रूटमेंट और प्रमोशन प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार और भौतिकी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो.टी.सी.उपाध्याय ने कार्यशाला के निदेशक डॉ.देवेंद्र सिंह और सह-कोर्स निदेशक डॉ.आलोक सागर गौतम को शुभकामनाएं दी। उन्होंने विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से आह्वान किया कि वे प्रयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाएं और शिक्षा को अधिक उपयोगी एवं प्रभावी बनाएं। सह-कोर्स निदेशक डॉ.आलोक सागर गौतम ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि यह दस दिवसीय कार्यशाला है जिसमें कुल 30 प्रतिभागियों का चयन आईसीएसएसआर के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया गया है। प्रतिभागियों में दिल्ली राजस्थान बिहार उत्तर प्रदेश उत्तराखंड हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से प्रतिनिधि शामिल हैं। उन्होंने बताया कि कार्यशाला के प्रत्येक दिन चार सत्र आयोजित किए जाएंगे जिनमें से तीन सत्र विशेषज्ञों द्वारा संचालित होंगे और एक सत्र में व्यावहारिक अभ्यास कराए जाएंगे। कार्यक्रम के अंत में कोर्स निदेशक डॉ.देवेंद्र सिंह ने आईसीएसएसआर के चेयरपर्सन प्रो.धनंजय सिंह तथा सभी अतिथियों प्रतिभागियों और आयोजन समिति का धन्यवाद किया। उन्होंने कुलपति प्रो.प्रकाश सिंह के मार्गदर्शन को विश्वविद्यालय की प्रगति का आधार बताया और सभी विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ.अनु राही द्वारा किया गया। इस अवसर पर शिक्षा एवं भौतिकी विभाग के प्राध्यापक शोधार्थी और प्रतिभागी उपस्थित रहे। यह कार्यशाला न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह शिक्षा और शोध के क्षेत्र में नई दिशा भी प्रदान कर रही है।

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