राजकीय मेडिकल कॉलेज के बेस अस्पताल में विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। राजकीय मेडिकल कॉलेज के बेस चिकित्सालय में मनोचिकित्सा विभाग द्वारा विश्व सिज़ोफ्रेनिया दिवस मनाया गया।वर्ष 2025 की थीम लेबल पर पुनर्विचार करें:कहानी को पुनःप्राप्त करें पर फोकस करते हुए मनाया गया। इस दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य सिज़ोफ्रेनिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना और जो एक जटिल और अक्सर गलत निदान की जाने वाली मानसिक बीमारी है। वहीं सिजोफ्रेनिया दिवस पर जागरूकता हेतु पंपलेट भी वितरित किये। बेस अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग की ओपीडी के पास आयोजित कार्यक्रम में विभाग के एचओडी डॉ.मोहित सैनी ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया को समझने और उससे बातचीत करने के हमारे तरीके में बदलाव के लिए है। सिज़ोफ्रेनिया को समझना:मिथक का जवाब देने के लिए विज्ञान का उपयोग करना जरूरी है। कहा कि सिज़ोफ्रेनिया एक पुराना मस्तिष्क विकार है जो व्यक्ति के विचारों,भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित करता है। शर्म का भार उपचार में एक बड़ी बाधा होती है। डॉ.सैनी ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में सामान्य आबादी की तुलना में कम उम्र में मरने का जोखिम दो से तीन गुना अधिक होता है।मृत्यु दर में वृद्धि:सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों की जीवन प्रत्याशा सामान्य आबादी की तुलना में 15-20 वर्ष कम होती है। डॉ.सैनी ने कहा कि हिंसक मिथक अध्ययनों से पता चलता है कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित केवल 10-15% लोग ही हिंसक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं,जिसका अर्थ है कि 85% से 90% लोग हिंसक व्यवहार नहीं करते हैं। यदि उपचार प्राप्त नहीं होता है तो मनोविकृति हो सकती है। डॉ.सैनी ने कहा कि इस वर्ष के अभियान के महत्वपूर्ण पहलू है कि मिथकों को चुनौती देना,अनुभव को अधिक मानवीय बनाना,जल्दी ईलाज को प्रोत्साहित करना,ईलाज से सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित कम से कम तीन में से एक व्यक्ति पूरी तरह से ठीक होता है,और बाकी मरीजों में निरंतर उपचार के साथ महत्वपूर्ण सुधार दिखाई देते है।इस अवसर पर मनोचिकित्सा विभाग के डॉक्टर पार्थ दत्ता ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया के गंभीर मानसिक रोग है,जो हमारे बीच में काफी सारे लोगों में होता है।कहा कि मनोचिकित्सा विभाग में हर दिन ओपीडी में 20-30 प्रतिशत मरीजों में सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण होते है,जिनका इलाज विभाग द्वारा किया जा रहा है।सिज़ोफ्रेनिया में विभिन्न तरह के लक्षण देखने को मिलते है,जैसे कानों में आवाजें सुनाये देना,अलग-अलग तरह के बीचार आना,शक-संदेह बनना,अकेले-अकेले में खोये रहना,अन्य से बात ना करना,बड़बड़ाना,गुस्सापन,चिड़चिड़ापन,नींद ना आना,भूख ना लगना कई लक्षण होते है। डॉ.दत्ता ने कहा कि यदि आपके आस-पास इस तरह के लक्षण वाला कोई है और समाज से कटता जा रहा है तो उन्हें जरूर मानसिक चिकित्सक के पास दिखाने जरूर लाये। बेस अस्पताल में इस तरह के सभी प्रकार के मरीजों का इलाज होता है। जिसमें आयुष्मान के जरिए नि:शुल्क इलाज करा सकते है।इस मौके पर डॉ.दीपा हटवाल,आरएस चौहान,जतिन सिंह,भवतोष,विजय जमोलोकी,नाहिद अख्तर सहित विभागीय जेआर, इंटर्न आदि मौजूद थे।
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राजकीय मेडिकल कॉलेज के बेस अस्पताल में विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। राजकीय मेडिकल कॉलेज के बेस चिकित्सालय में मनोचिकित्सा विभाग द्वारा विश्व सिज़ोफ्रेनिया दिवस मनाया गया।वर्ष 2025 की थीम लेबल पर पुनर्विचार करें:कहानी को पुनःप्राप्त करें पर फोकस करते हुए मनाया गया। इस दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य सिज़ोफ्रेनिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना और जो एक जटिल और अक्सर गलत निदान की जाने वाली मानसिक बीमारी है। वहीं सिजोफ्रेनिया दिवस पर जागरूकता हेतु पंपलेट भी वितरित किये। बेस अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग की ओपीडी के पास आयोजित कार्यक्रम में विभाग के एचओडी डॉ.मोहित सैनी ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया को समझने और उससे बातचीत करने के हमारे तरीके में बदलाव के लिए है। सिज़ोफ्रेनिया को समझना:मिथक का जवाब देने के लिए विज्ञान का उपयोग करना जरूरी है। कहा कि सिज़ोफ्रेनिया एक पुराना मस्तिष्क विकार है जो व्यक्ति के विचारों,भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित करता है। शर्म का भार उपचार में एक बड़ी बाधा होती है। डॉ.सैनी ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में सामान्य आबादी की तुलना में कम उम्र में मरने का जोखिम दो से तीन गुना अधिक होता है।मृत्यु दर में वृद्धि:सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों की जीवन प्रत्याशा सामान्य आबादी की तुलना में 15-20 वर्ष कम होती है। डॉ.सैनी ने कहा कि हिंसक मिथक अध्ययनों से पता चलता है कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित केवल 10-15% लोग ही हिंसक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं,जिसका अर्थ है कि 85% से 90% लोग हिंसक व्यवहार नहीं करते हैं। यदि उपचार प्राप्त नहीं होता है तो मनोविकृति हो सकती है। डॉ.सैनी ने कहा कि इस वर्ष के अभियान के महत्वपूर्ण पहलू है कि मिथकों को चुनौती देना,अनुभव को अधिक मानवीय बनाना,जल्दी ईलाज को प्रोत्साहित करना,ईलाज से सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित कम से कम तीन में से एक व्यक्ति पूरी तरह से ठीक होता है,और बाकी मरीजों में निरंतर उपचार के साथ महत्वपूर्ण सुधार दिखाई देते है।इस अवसर पर मनोचिकित्सा विभाग के डॉक्टर पार्थ दत्ता ने कहा कि सिज़ोफ्रेनिया के गंभीर मानसिक रोग है,जो हमारे बीच में काफी सारे लोगों में होता है।कहा कि मनोचिकित्सा विभाग में हर दिन ओपीडी में 20-30 प्रतिशत मरीजों में सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण होते है,जिनका इलाज विभाग द्वारा किया जा रहा है।सिज़ोफ्रेनिया में विभिन्न तरह के लक्षण देखने को मिलते है,जैसे कानों में आवाजें सुनाये देना,अलग-अलग तरह के बीचार आना,शक-संदेह बनना,अकेले-अकेले में खोये रहना,अन्य से बात ना करना,बड़बड़ाना,गुस्सापन,चिड़चिड़ापन,नींद ना आना,भूख ना लगना कई लक्षण होते है। डॉ.दत्ता ने कहा कि यदि आपके आस-पास इस तरह के लक्षण वाला कोई है और समाज से कटता जा रहा है तो उन्हें जरूर मानसिक चिकित्सक के पास दिखाने जरूर लाये। बेस अस्पताल में इस तरह के सभी प्रकार के मरीजों का इलाज होता है। जिसमें आयुष्मान के जरिए नि:शुल्क इलाज करा सकते है।इस मौके पर डॉ.दीपा हटवाल,आरएस चौहान,जतिन सिंह,भवतोष,विजय जमोलोकी,नाहिद अख्तर सहित विभागीय जेआर, इंटर्न आदि मौजूद थे।