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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। श्रीनगर के प्राचीन शंकर मठ मंदिर और उसके आसपास सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था भागीरथी कला संगम द्वारा स्वच्छता अभियान चलाया गया। सुबह लगभग छह बजे शुरू हुए इस अभियान में संस्था के सदस्यों ने मंदिर परिसर में पहुंचकर सफाई कार्य प्रारंभ किया। करीब ढाई घंटे तक चले इस कार्यक्रम में सभी ने श्रमदान कर परिसर को स्वच्छ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस अवसर पर मंदिर के महंत महादेव प्रसाद उनियाल ने संस्था का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भागीरथी कला संगम पिछले कई वर्षों से शहर के मठ-मंदिरों पार्कों नदी तटों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर निस्वार्थ भाव से स्वच्छता कार्य कर रहा है। संस्था लोगों को लगातार जागरूक कर रही है कि अपने आसपास कूड़ा प्लास्टिक और किसी भी प्रकार की गंदगी न फैलाएं और स्वच्छ वातावरण बनाए रखें। कार्यक्रम के दौरान मंदिर के पुजारी गोविंद उनियाल ने शंकर मठ मंदिर के पौराणिक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पुराना श्रीनगर गढ़वाल प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल रहा है और यह स्थान यहां के आराध्य देव से जुड़ा हुआ है। शंकर मठ मंदिर में लक्ष्मी नारायण की काले शालिग्राम पत्थर से बनी विशाल दर्शनीय और मन को आकर्षित करने वाली मूर्तियां स्थापित हैं जो श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। उन्होंने बताया कि यह स्थल उस समय से जुड़ा है जब भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र प्राप्त नहीं हुआ था और यहां उनकी सुदर्शन चक्र रहित मूर्ति विराजमान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार राजा बलि के शासन काल में कार्तिक मास की चतुर्दशी के दिन शिव ने विष्णु को लोक कल्याण के लिए सुदर्शन चक्र प्रदान किया था। इसी परंपरा के तहत श्रीनगर में कार्तिक मास की चतुर्दशी और पूर्णिमा के अवसर पर सबसे पहले शंकर मठ में दीपदान किया जाता है इसके बाद स्वयंभू शिव के प्रिय स्थान कमलेश्वर महादेव मंदिर में अखंड दीपदान की परंपरा निभाई जाती है।‌ इस दौरान दीपदान के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन भी होता है जिसे नगर निगम और जिला प्रशासन के सहयोग से हर वर्ष आयोजित किया जाता है। यह आयोजन प्राचीन सनातन परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। पुजारी ने यह भी बताया कि शंकर मठ को लक्ष्मी के जन्म और विवाह स्थल के रूप में भी माना जाता है। साथ ही यह मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य को इसी स्थान पर मां शक्ति के दिव्य दर्शन प्राप्त हुए थे और यहीं उन्हें वह दिव्य शक्ति मिली जिसके माध्यम से उन्होंने बद्री विशाल की मूर्ति को नारद कुंड से निकालकर पुनः स्थापित किया। उन्होंने बताया कि इसी पावन स्थल पर शंकराचार्य द्वारा मां के चरणों में क्षमा याचना का प्रसिद्ध पाठ भी किया गया था। आज भी उत्तराखंड की धार्मिक पहचान इन प्राचीन मठ-मंदिरों से जुड़ी हुई है जो प्रदेश नगर और देश के गौरव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सरकार और प्रशासन द्वारा भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कार्यक्रम के अंत में समिति अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद बर्थवाल ने सभी का धन्यवाद किया। इस अवसर पर संस्था के वरिष्ठ संरक्षक रमेश चंद्र थपलियाल भगत सिंह बिष्ट सचिव पदविंदर रावत कोषाध्यक्ष हरिंदर तोमर डायरेक्टर मदन गडोई सांस्कृतिक सचिव संजय कोठारी रवि पुरी रघुवीर सिंह रावत धर्मेंद्र अरुण नेगी सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।

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