प्रदीप कुमार
देहरादून/श्रीनगर गढ़वाल। देहरादून में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तराखंड प्रवास के दौरान निम्बूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र गढ़ी कैंट में पूर्व सैनिकों एवं पूर्व सेना अधिकारियों के साथ प्रमुख जन गोष्ठी और समन्वित संवाद कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम में सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी और सैकड़ों पूर्व सैनिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में पूर्व मेजर जनरल गुलाब सिंह रावत कर्नल अजय कोठियाल और कर्नल मयंक चौबे ने उनका पारंपरिक सम्मान किया। इस अवसर पर छह सेवानिवृत्त जनरल एक वाइस एडमिरल डीजी कोस्ट गार्ड कई ब्रिगेडियर तथा 50 से अधिक कर्नल रैंक के अधिकारी मौजूद रहे। बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक सैन्य वेश में राष्ट्रभाव से ओतप्रोत सहभागिता करते दिखाई दिए। अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि समाज ही राष्ट्र की आत्मा है और संगठित समाज ही सुरक्षा की गारंटी है। उन्होंने कहा कि यदि समाज सशक्त होगा तो राष्ट्र स्वतः सुरक्षित रहेगा। व्यक्ति निर्माण से ही राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त होता है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की चेतना कभी समाप्त नहीं हुई।संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनका मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण था चुनावी राजनीति नहीं। संघ का उद्देश्य प्रचार नहीं बल्कि समाज संगठन और राष्ट्र उत्थान है।जिज्ञासा सत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा सामाजिक समरसता युवा पीढ़ी और नीतिगत विषयों पर प्रश्न उठाए गए। अग्निवीर योजना के संबंध में उन्होंने कहा कि किसी भी नई व्यवस्था को अनुभव के आधार पर परिमार्जित किया जाना चाहिए। नेपाल बांग्लादेश और कश्मीर से जुड़े प्रश्नों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि कश्मीर भारत की अखंड अस्मिता का प्रतीक और अभिन्न अंग है। सीमाओं की सुरक्षा के साथ समाज की भी सजग सुरक्षा आवश्यक है। सामाजिक समरसता पर उन्होंने कहा कि मंदिर जलस्रोत और श्मशान जैसे सार्वजनिक स्थान सभी के लिए समान रूप से खुले होने चाहिए। भारतीय चिंतन का मूल वसुधैव कुटुंबकम् की भावना है। संवाद और शास्त्रार्थ से ही वैचारिक स्पष्टता आती है और कटुता का समाधान संभव है। भ्रष्टाचार को उन्होंने व्यवस्था नहीं बल्कि नियत की समस्या बताया।संस्कार संयम और सेवा को राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला बताते हुए उन्होंने कहा कि स्वार्थ से ऊपर उठकर परोपकार में आनंद की साधना करनी चाहिए।गढ़वाल और पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने शिक्षा स्वास्थ्य और स्थानीय उद्यमिता को समाधान का आधार बताया। समान नागरिक संहिता को राष्ट्रीय एकात्मता का साधन बताते हुए व्यापक सामाजिक सहमति की आवश्यकता जताई। जनसंख्या असंतुलन पर दीर्घकालिक नीति बनाने की बात भी कही। उन्होंने पूर्व सैनिकों से आह्वान किया कि सीमाओं के प्रहरी अब समाज के भी पथप्रदर्शक बनें।देशभर में एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित हैं और शताब्दी वर्ष में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी महत्त्वपूर्ण है।
राष्ट्रधर्म का उद्घोष
1-समाज ही राष्ट्र की आत्मा है
2-संगठित समाज ही सुरक्षा की गारंटी
3-व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मार्ग
वीरों के संग वैचारिक संगम
1-6 सेवानिवृत्त जनरल
2-वाइस एडमिरल
3-डीजी कोस्ट गार्ड
4-अनेक ब्रिगेडियर
5-50 से अधिक कर्नल रैंक अधिकारी
6-सैकड़ों पूर्व सैनिकों की गरिमामयी उपस्थिति
सुरक्षा और स्वाभिमान
1-अग्निवीर योजना में अनुभव आधारित परिमार्जन की आवश्यकता
2-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग और अखंड अस्मिता का प्रतीक
3-सीमाओं के साथ समाज की भी सजग सुरक्षा जरूरी
समरस समाज सशक्त भारत
1-मंदिर जलस्रोत और श्मशान सभी के लिए समान अधिकार
2-वसुधैव कुटुंबकम् भारतीय चिंतन का मूल
3-संवाद और शास्त्रार्थ से ही वैचारिक स्पष्टता
चरित्र ही राष्ट्र की पूंजी
1-भ्रष्टाचार व्यवस्था नहीं नियत की समस्या
2-संस्कार संयम और सेवा से राष्ट्रनिर्माण
3-स्वार्थ त्याग कर परोपकार में आनंद
शताब्दी वर्ष का आह्वान
1-1,30,000 से अधिक सेवा प्रकल्पों से जुड़ने का संदेश
2-सीमाओं के प्रहरी समाज के भी पथप्रदर्शक बनें
3-संघ का उद्देश्य प्रचार नहीं राष्ट्र उत्थान
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन के साथ हुआ।
