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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता विशेष संदर्भ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का द्वितीय दिवस तकनीकी सत्रों एवं समापन समारोह के साथ संपन्न हुआ। 18 अप्रैल को शिक्षा संकाय में आयोजित समापन समारोह का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ जो भारतीय ज्ञान परंपरा की उज्ज्वल और सतत विरासत का प्रतीक रहा। इस अवसर पर संगोष्ठी के संयोजक डॉ.अमरजीत सिंह परिहार ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया जबकि सह संयोजक डॉ.पुनीत वालिया ने दो दिवसीय संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए विभिन्न सत्रों के प्रमुख निष्कर्षों और उपलब्धियों को रेखांकित किया। मुख्य अतिथि प्रो.के जी सुरेश ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा को एक जीवंत अनुभवपरक और जीवनोपयोगी परंपरा बताया। उन्होंने डिकॉलोनाइजेशन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अपनी भाषा संस्कृति और बौद्धिक परंपराओं के प्रति सम्मान विकसित किए बिना सशक्त शिक्षा प्रणाली की कल्पना अधूरी है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित पाठ्यक्रमों के विकास अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने पर जोर दिया। विशिष्ट वक्ता प्रो.पी वी बी सुब्रह्मण्यम ने अंतर्विषयक दृष्टिकोण अपनाने पर बल देते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति के साथ पारंपरिक ज्ञान का संतुलित समन्वय ही समग्र विकास का मार्ग है। उन्होंने स्थानीय भाषाओं परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण को भी आवश्यक बताया। अतिथि विशेष प्रो.ओम प्रकाश गुसाईं ने भारतीय ज्ञान परंपरा के शैक्षिक वैज्ञानिक और दार्शनिक आयामों को रेखांकित किया। प्रो.डी एस नेगी ने शिक्षा के माध्यम से मूल्यों के संवर्धन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास और विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करने में इसकी भूमिका स्पष्ट की। डॉ.आर एस फर्तियाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों को रेखांकित करते हुए इसे वर्तमान और भविष्य के सतत विकास का आधार बताया। प्रो.रमा मैखुरी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल सैद्धांतिक विमर्श तक सीमित न रखकर उसे शिक्षा के व्यवहारिक पक्ष से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने पाठ्यक्रम निर्माण शिक्षण विधियों और मूल्यांकन प्रणाली में इसके समावेश पर बल दिया तथा परियोजना आधारित अधिगम स्थानीय ज्ञान और अनुभवात्मक शिक्षण को अपनाने की आवश्यकता बताई। प्रो.अनिल कुमार नौटियाल ने संगोष्ठी को उपयोगी और समसामयिक बताते हुए कहा कि ऐसे अकादमिक मंच भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने और शोध व नवाचार को नई दिशा देने में सहायक होते हैं। तकनीकी सत्र तीन की अध्यक्षता प्रो गीता खंडूरी ने की जिसमें मुख्य वक्ता प्रो हेमवती नंदन ने हिमालयी लोक संपदा के संदर्भ में भारतीय ज्ञान प्रणाली को जीवन से जुड़ी परंपरा बताया। उन्होंने पारंपरिक वैद्य परंपरा के लुप्त होने पर चिंता जताई और जलवायु परिवर्तन भूस्खलन तथा भूकंपीय गतिविधियों को प्रमुख चुनौतियां बताया। साथ ही लोकभाषा लोकभोजन और लोककला के संरक्षण पर बल दिया। सत्र में आर्यभट्ट पंचकोश आधारित शिक्षा भारतीय भाषाओं और जल चेतना पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। तकनीकी सत्र पांच में साहित्य योग महिला स्वास्थ्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से स्वदेशी ज्ञान संरक्षण पारंपरिक अनाज भंडारण और पंचकोशीय योग से व्यक्तित्व विकास जैसे विषयों पर शोध प्रस्तुत किए गए।वक्ताओं ने परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय को आवश्यक बताया। सह अध्यक्ष डॉ.दिनेश चन्द्र पाण्डेय ने संस्कृत में अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे वर्तमान शिक्षा प्रणाली में समाहित करने की आवश्यकता बताई। अध्यक्षता करते हुए प्रो गीता खंडूरी ने कहा कि यह हमारी बौद्धिक और सांस्कृतिक धरोहर है जिसे वर्तमान शिक्षा प्रणाली के साथ समन्वित करना जरूरी है। सह अध्यक्ष डॉ.अनुजा रावत डॉ.डी के राणा और जगमोहन सिंह कठैत सहित अन्य सह अध्यक्षों ने संयुक्त रूप से कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा प्रणाली में उचित स्थान देना आवश्यक है और परंपरागत ज्ञान व आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही समग्र शिक्षा संभव है। संगोष्ठी के दौरान एक ऑनलाइन तकनीकी सत्र भी आयोजित किया गया जिसमें मुख्य वक्ता प्रो.प्रवीण तिवारी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के समकालीन संदर्भों पर विचार रखे और इसे आधुनिक शिक्षा अनुसंधान तथा समाजोपयोगी नवाचारों से जोड़ने पर बल दिया। विशिष्ट वक्ता प्रो.विश्वजीत दास ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक परिप्रेक्ष्य को रेखांकित किया जबकि प्रो.सीमा धवन और डॉ.पूजा वालिया ने इसके व्यावहारिक पक्षों और समाज में उपयोग की संभावनाओं को स्पष्ट किया। सत्र का संचालन डॉ.सुमन लता तिरुवा और डॉ.नागेंद्र कुमार यादव ने संयुक्त रूप से किया।अंत में डॉ.शंकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.अनु राही और डॉ.सपना सेन ने किया जिनके प्रभावी संचालन से पूरा आयोजन गरिमामय रहा।

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