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श्री श्याम पोर्टल-प्रदीप कुमार 

श्रीनगर गढ़वाल। श्रीनगर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास स्थित शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में मानव संसाधन विकास केंद्र के तत्वावधान में पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण विषय पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में 95 से अधिक शिक्षक और शोधार्थी प्रतिभाग कर रहे हैं। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के प्रो.आरएल नारायण सिन्हा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पर्यवेक्षक के रूप में मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वैश्विक ज्ञान विमर्श की आधारशिला है। ऐसे पाठ्यक्रम भारतीय शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान करेंगे। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.एनएस पंवार ने भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में भारतीय दृष्टि का समावेश आवश्यक है। चौरास परिसर निदेशक प्रो.आरएस नेगी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए। प्रो.राजेंद्र सिंह नेगी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं। प्रो.अनिल नौटियाल ने कहा कि भारतीय शिक्षा और संस्कृति का वैश्विक प्रभाव सदियों से स्थापित रहा है जिसे पाठ्यक्रमीय संरचना में समुचित स्थान मिलना चाहिए। कार्यक्रम समन्वयक डॉ.अमरजीत सिंह ने कार्यक्रम की रूपरेखा और उद्देश्यों की जानकारी दी। सह-निदेशक डॉ.राहुल कुंवर सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। मंचासीन अतिथियों को स्मृति चिह्न और अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। अंत में डॉ.सोमेश थपलियाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह तथा केंद्र के निदेशक प्रो.डीएस नेगी के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.पुनीत वालिया और शोधार्थी सागर पुरी ने किया। कार्यक्रम के प्रथम दिवस में पांच सत्र आयोजित किए गए। श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय की प्रो.कल्पना पंत तथा अमेटी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रशिक्षक डॉ.कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली की वैचारिक आधारभूमि पर व्याख्यान प्रस्तुत किए। प्रो.कल्पना पंत ने भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा वेद उपनिषद विभिन्न दर्शन शास्त्रों और लोकानुभव से निर्मित एक समन्वित बौद्धिक परंपरा है जिसमें ज्ञान को तर्क या इंद्रिय अनुभव तक सीमित न रखकर आत्मानुभूति नैतिकता और लोकमंगल से जोड़ा गया है। उन्होंने न्याय सांख्य योग मीमांसा और वेदांत को भारतीय ज्ञान प्रणाली की आधारशिला बताया। डॉ.कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक समग्र ज्ञान संरचना बताते हुए कहा कि यह केवल दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं बल्कि शिक्षा समाज शासन स्वास्थ्य और जीवन व्यवहार से जुड़ी एक जीवंत और व्यवहारिक परंपरा है जिसे समकालीन पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक दृष्टि और आलोचनात्मक चिंतन के साथ समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।

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