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प्रदीप कुमार
टिहरी/श्रीनगर गढ़वाल। टिहरी गढ़वाल के विकासखंड जौनपुर अंतर्गत तहसील नैनबाग की पट्टी ईडवालस्यूँ स्थित प्राचीन देवस्थल देवीथात में आयोजित होने वाला गोठी मेला क्षेत्र की धार्मिक आस्था लोक संस्कृति और सदियों पुरानी देव परंपराओं का जीवंत प्रतीक बनकर आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। श्रावण मास की 15 गते आयोजित इस पारंपरिक मेले में इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर मां गौरजा और भगवान नागराज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। क्षेत्र में इस मेले के साथ पर्व-त्योहारों के शुभारंभ की मान्यता भी जुड़ी हुई है। लोकमान्यताओं के अनुसार प्राचीन देवस्थल देवीथात में मां गौरजा का दिव्य निवास है जबकि भगवान नागराज वर्ष में दो बार—बैसाख मास की द्वितीया और भाद्रपद में जन्माष्टमी के बाद—अपने सिद्धधाम नागटिब्बा से दिव्य घोड़ी पर सवार होकर अपनी बहन मां गौरजा से मिलने यहां पहुंचते हैं। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि पूर्वकाल में कई लोगों को इस दिव्य मिलन के दर्शन हुए थे। आज भी यह परंपरा जारी है लेकिन इसके दर्शन किसी को नहीं हो पाते। यही मान्यता इस देवस्थल को क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाती है। गोठी मेले की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि क्षेत्र के ग्वाल-बाल बुग्याल में मिट्टी से भगवान नागदेवता का स्वरूप बनाकर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं। इसके बाद केदार पाती दही मक्खन धूप दीप पुष्प और प्रसाद अर्पित कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि अच्छी कृषि पशुधन की उन्नति और जनकल्याण की कामना की जाती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा विश्वास और आत्मीयता के साथ निभाई जा रही है। पूर्व सैनिक एवं ग्राम प्रधान भटवाड़ी सुनील सेमवाल ने बताया कि इस वर्ष 31 जुलाई को गोठी मेले का आयोजन पारंपरिक रीति-रिवाजों और पूरे हर्षोल्लास के साथ किया गया। मेले में पट्टी ईडवालस्यूँ, जौनपुर क्षेत्र सहित दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां गौरजा और भगवान नागराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि अपनी अनूठी लोक परंपराओं धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता के कारण यह मेला वर्षों से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है और नई पीढ़ी भी इसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी निभा रही है। प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी देवीथात का विशेष महत्व है। यहां से भगवान नागराज के सिद्धधाम नागटिब्बा तथा कोट श्रीकोट के दिव्य दर्शन होते हैं। देवदार बांज और बुरांश के घने जंगलों से घिरा यह देवस्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ हिमालय की मनमोहक प्राकृतिक छटा का भी अनुभव कराता है। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद देवीथात का गोठी मेला आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों लोकसंस्कृति और देव परंपराओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना हुआ है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है जिसे स्थानीय समाज ने अपनी आस्था परंपराओं और सामूहिक सहभागिता के बल पर आज तक सुरक्षित रखा है।

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