प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सिफरी) बैरकपुर कोलकाता जंतु विज्ञान विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल की संयुक्त पहल पर अलकनंदा नदी के बांध क्षेत्र के ऊपरी हिस्से में धारी देवी के निकट 7000 महाशीर मछली की अंगुलिकाओं को प्रवाहित किया गया। नदीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के संरक्षण के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यक्रम को महाशीर प्रजाति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मंजू प्रकाश गुसाईं डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर ओ.पी.गुसाईं यूनिवर्सिटी फिश हैचरी के समन्वयक प्रोफेसर दीपक सिंह मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल से पुष्कर सिंह नयाल और संजय सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस दौरान नदी संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा जलीय जीवों के संवर्धन पर जोर दिया गया। प्रोफेसर दीपक सिंह ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि यह नदियों की जैव विविधता को बनाए रखने की दिशा में एक ठोस कदम है। उन्होंने बताया कि महाशीर को उत्तराखंड की राज्य मछली का दर्जा प्राप्त है लेकिन प्रदेश की नदियों में इसकी संख्या लगातार घटती जा रही है। विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने भी इस प्रजाति को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है इसलिए इसके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने बताया कि जंतु विज्ञान विभाग चौरास परिसर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में महाशीर प्रजाति के संरक्षण के लिए अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से फिश हैचरी विकसित की गई थी। इसी हैचरी तथा टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में तैयार की गई महाशीर प्रजाति की 7000 अंगुलिकाओं को अलकनंदा नदी में छोड़ा गया। दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान बैरकपुर द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। विशेषज्ञों ने बताया कि महाशीर हिमालयी क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण मछली है जिसका नदीय पारिस्थितिकी तंत्र में अहम योगदान होता है। विभिन्न कारणों से इसकी संख्या में लगातार गिरावट आई है जिसके चलते इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक डॉ.उपेंद्र सिंह डॉ.जितेंद्र सिंह राणा और डॉ.रणजीत सिंह ने महाशीर मछली की उपयोगिता एवं संरक्षण पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अब तक लगभग 40 हजार महाशीर मछलियों के बच्चों को गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के विभिन्न स्थानों पर छोड़ा जा चुका है। कार्यक्रम में शोधार्थी सचिन राहुल अजय आयुष राकेश सहित अन्य विद्यार्थियों और स्थानीय मत्स्य पालकों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने नदियों को स्वच्छ समृद्ध और जीवंत बनाए रखने तथा जलीय जैव विविधता के संरक्षण में सक्रिय योगदान देने का संकल्प लिया।
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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सिफरी) बैरकपुर कोलकाता जंतु विज्ञान विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल की संयुक्त पहल पर अलकनंदा नदी के बांध क्षेत्र के ऊपरी हिस्से में धारी देवी के निकट 7000 महाशीर मछली की अंगुलिकाओं को प्रवाहित किया गया। नदीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के संरक्षण के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यक्रम को महाशीर प्रजाति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मंजू प्रकाश गुसाईं डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर ओ.पी.गुसाईं यूनिवर्सिटी फिश हैचरी के समन्वयक प्रोफेसर दीपक सिंह मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल से पुष्कर सिंह नयाल और संजय सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस दौरान नदी संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा जलीय जीवों के संवर्धन पर जोर दिया गया। प्रोफेसर दीपक सिंह ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि यह नदियों की जैव विविधता को बनाए रखने की दिशा में एक ठोस कदम है। उन्होंने बताया कि महाशीर को उत्तराखंड की राज्य मछली का दर्जा प्राप्त है लेकिन प्रदेश की नदियों में इसकी संख्या लगातार घटती जा रही है। विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने भी इस प्रजाति को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है इसलिए इसके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने बताया कि जंतु विज्ञान विभाग चौरास परिसर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में महाशीर प्रजाति के संरक्षण के लिए अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से फिश हैचरी विकसित की गई थी। इसी हैचरी तथा टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में तैयार की गई महाशीर प्रजाति की 7000 अंगुलिकाओं को अलकनंदा नदी में छोड़ा गया। दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान बैरकपुर द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। विशेषज्ञों ने बताया कि महाशीर हिमालयी क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण मछली है जिसका नदीय पारिस्थितिकी तंत्र में अहम योगदान होता है। विभिन्न कारणों से इसकी संख्या में लगातार गिरावट आई है जिसके चलते इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक डॉ.उपेंद्र सिंह डॉ.जितेंद्र सिंह राणा और डॉ.रणजीत सिंह ने महाशीर मछली की उपयोगिता एवं संरक्षण पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अब तक लगभग 40 हजार महाशीर मछलियों के बच्चों को गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के विभिन्न स्थानों पर छोड़ा जा चुका है। कार्यक्रम में शोधार्थी सचिन राहुल अजय आयुष राकेश सहित अन्य विद्यार्थियों और स्थानीय मत्स्य पालकों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने नदियों को स्वच्छ समृद्ध और जीवंत बनाए रखने तथा जलीय जैव विविधता के संरक्षण में सक्रिय योगदान देने का संकल्प लिया।