प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ.अम्बेडकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एवं निःशुल्क सिविल सेवा कोचिंग योजना के संयुक्त तत्वावधान में बीएनएस के अंतर्गत मानवाधिकार एवं आपराधिक न्याय” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सिविल सेवा अभ्यर्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ योजना के समन्वयक प्रो.एम.एम. सेमवाल द्वारा अतिथियों एवं प्रतिभागियों के स्वागत के साथ किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने मौलिक अधिकारों मानवाधिकारों तथा भारतीय न्याय संहिता के संदर्भ में आपराधिक न्याय व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संवेदनशील एवं उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माण में मानवाधिकारों की समझ अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भावी सिविल सेवकों को न्याय व्यवस्था के बदलते स्वरूप से परिचित होना चाहिए। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता उत्तराखंड के जेल अधीक्षक अभिलाष गैरोला रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में मानवाधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली तथा भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता के बीच प्रमुख अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि नई आपराधिक न्याय व्यवस्था का उद्देश्य न्याय को अधिक प्रभावी पारदर्शी और नागरिक केंद्रित बनाना है। उन्होंने बताया कि नई आपराधिक विधियों में तकनीकी अपराधों संगठित अपराधों तथा महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों को अधिक गंभीरता से संबोधित किया गया है। बदलते सामाजिक एवं तकनीकी परिवेश में कानूनों का अद्यतन होना आवश्यक है ताकि न्याय व्यवस्था समकालीन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके। अभिलाष गैरोला ने बंदियों के अधिकारों पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि कारागार में निरुद्ध व्यक्ति अपने सभी अधिकार नहीं खोता। जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सम्मानजनक व्यवहार का अधिकार स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकार तथा विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार प्रत्येक बंदी को प्राप्त है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जेल प्रशासन का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि अपराधियों का सुधार और पुनर्वास भी है। उन्होंने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए निष्पक्ष सुनवाई और पक्षपात रहित निर्णय को किसी भी न्याय व्यवस्था की आधारशिला बताया। साथ ही भारतीय न्यायपालिका की संरचना सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालयों एवं अधीनस्थ न्यायालयों की भूमिका पर भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक होने के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक एवं मानवाधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने न्याय तक समान पहुंच और निःशुल्क विधिक सहायता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भावी सिविल सेवकों के लिए मानवाधिकारों विधि के शासन संवैधानिक मूल्यों एवं आपराधिक न्याय प्रणाली की गहन समझ अत्यंत आवश्यक है। प्रशासनिक अधिकारियों को अपने निर्णयों में संवेदनशीलता निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जिससे सुशासन एवं न्यायपूर्ण समाज की स्थापना सुनिश्चित हो सके। व्याख्यान के दौरान उन्होंने कारागार प्रशासन से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सुधारात्मक कार्यक्रम कौशल विकास शिक्षा एवं परामर्श सेवाएं बंदियों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था का लक्ष्य केवल अपराध का दंड नहीं बल्कि अपराधियों को समाज की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करना भी है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने मानवाधिकारों कारागार प्रशासन न्यायिक प्रक्रिया एवं भारतीय न्याय संहिता से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। इस व्याख्यान ने विद्यार्थियों को समकालीन आपराधिक न्याय प्रणाली एवं मानवाधिकारों की गहन समझ प्रदान की। कार्यक्रम के सफल एवं सुव्यवस्थित आयोजन में डॉ.आशीष बहुगुणा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके कुशल समन्वय एवं प्रयासों से कार्यक्रम प्रभावी एवं ज्ञानवर्धक रहा। इस अवसर पर डॉ.प्रकाश सिंह डॉ.अरविन्द रावत डॉ.वीर सिंह डॉ.शैलेन्द्र चमोला तथा डॉ.मुकेश सहाय सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ.अम्बेडकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एवं निःशुल्क सिविल सेवा कोचिंग योजना के संयुक्त तत्वावधान में बीएनएस के अंतर्गत मानवाधिकार एवं आपराधिक न्याय” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सिविल सेवा अभ्यर्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ योजना के समन्वयक प्रो.एम.एम. सेमवाल द्वारा अतिथियों एवं प्रतिभागियों के स्वागत के साथ किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने मौलिक अधिकारों मानवाधिकारों तथा भारतीय न्याय संहिता के संदर्भ में आपराधिक न्याय व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संवेदनशील एवं उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माण में मानवाधिकारों की समझ अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भावी सिविल सेवकों को न्याय व्यवस्था के बदलते स्वरूप से परिचित होना चाहिए। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता उत्तराखंड के जेल अधीक्षक अभिलाष गैरोला रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में मानवाधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली तथा भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता के बीच प्रमुख अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि नई आपराधिक न्याय व्यवस्था का उद्देश्य न्याय को अधिक प्रभावी पारदर्शी और नागरिक केंद्रित बनाना है। उन्होंने बताया कि नई आपराधिक विधियों में तकनीकी अपराधों संगठित अपराधों तथा महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों को अधिक गंभीरता से संबोधित किया गया है। बदलते सामाजिक एवं तकनीकी परिवेश में कानूनों का अद्यतन होना आवश्यक है ताकि न्याय व्यवस्था समकालीन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके। अभिलाष गैरोला ने बंदियों के अधिकारों पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि कारागार में निरुद्ध व्यक्ति अपने सभी अधिकार नहीं खोता। जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सम्मानजनक व्यवहार का अधिकार स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकार तथा विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार प्रत्येक बंदी को प्राप्त है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जेल प्रशासन का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि अपराधियों का सुधार और पुनर्वास भी है। उन्होंने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए निष्पक्ष सुनवाई और पक्षपात रहित निर्णय को किसी भी न्याय व्यवस्था की आधारशिला बताया। साथ ही भारतीय न्यायपालिका की संरचना सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालयों एवं अधीनस्थ न्यायालयों की भूमिका पर भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक होने के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक एवं मानवाधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने न्याय तक समान पहुंच और निःशुल्क विधिक सहायता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भावी सिविल सेवकों के लिए मानवाधिकारों विधि के शासन संवैधानिक मूल्यों एवं आपराधिक न्याय प्रणाली की गहन समझ अत्यंत आवश्यक है। प्रशासनिक अधिकारियों को अपने निर्णयों में संवेदनशीलता निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जिससे सुशासन एवं न्यायपूर्ण समाज की स्थापना सुनिश्चित हो सके। व्याख्यान के दौरान उन्होंने कारागार प्रशासन से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सुधारात्मक कार्यक्रम कौशल विकास शिक्षा एवं परामर्श सेवाएं बंदियों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था का लक्ष्य केवल अपराध का दंड नहीं बल्कि अपराधियों को समाज की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करना भी है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने मानवाधिकारों कारागार प्रशासन न्यायिक प्रक्रिया एवं भारतीय न्याय संहिता से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। इस व्याख्यान ने विद्यार्थियों को समकालीन आपराधिक न्याय प्रणाली एवं मानवाधिकारों की गहन समझ प्रदान की। कार्यक्रम के सफल एवं सुव्यवस्थित आयोजन में डॉ.आशीष बहुगुणा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके कुशल समन्वय एवं प्रयासों से कार्यक्रम प्रभावी एवं ज्ञानवर्धक रहा। इस अवसर पर डॉ.प्रकाश सिंह डॉ.अरविन्द रावत डॉ.वीर सिंह डॉ.शैलेन्द्र चमोला तथा डॉ.मुकेश सहाय सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।