प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का बुघाणी रोड स्थित चित्रा गार्डन पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की दिशा में एक सफल मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है। विश्वविद्यालय की लगभग 3.5 हेक्टेयर बंजर भूमि को विकसित कर तैयार किए गए इस मिश्रित वन ने मात्र छह वर्षों में लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर उसे जैविक रूप से सुरक्षित (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन) किया है। यह उपलब्धि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विश्वविद्यालय के प्रयासों को नई पहचान दिला रही है। विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो.अन्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के निदेशक डॉ.विजय कांत पुरोहित तथा अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल के प्रयासों से इस परियोजना की शुरुआत की गई। वर्ष 2020 तक यह क्षेत्र पूरी तरह सूखी पथरीली और बंजर भूमि था लेकिन सुनियोजित वृक्षारोपण और वैज्ञानिक देखरेख के चलते आज यहां लगभग 2,500 पेड़ और 40 से अधिक प्रजातियों का समृद्ध मिश्रित वन विकसित हो चुका है। चित्रा गार्डन में जामुन शहतूत आंवला बेल बांज बांस सेब खुबानी सहित अनेक स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों का उच्च घनत्व वाले मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल के तहत रोपण किया गया है। इस मॉडल ने न केवल हरित क्षेत्र का विस्तार किया है बल्कि जैव विविधता संरक्षण और कार्बन अवशोषण की दृष्टि से भी उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। हैप्रेक के निदेशक डॉ.विजय कांत पुरोहित ने बताया कि हाल ही में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में चित्रा गार्डन में लगभग 23 टन कार्बन संग्रहित पाया गया है जो लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। उन्होंने बताया कि यह वन प्रतिवर्ष लगभग 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण से अवशोषित कर रहा है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है। वैज्ञानिक डॉ.राजीव वशिष्ठ ने बताया कि इस मिश्रित वन में कार्बन संग्रहण में शहतूत और जामुन की प्रजातियों का लगभग 58 प्रतिशत योगदान है। वहीं डेंकन और आंवला को शामिल करने पर चार प्रमुख प्रजातियां मिलकर लगभग 80 प्रतिशत कार्बन संग्रहण के लिए जिम्मेदार हैं। प्रति पौधा कार्बन अवशोषण क्षमता के आधार पर बांस और परिपक्व आंवला सबसे प्रभावी प्रजातियां पाई गई हैं। हैप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.सुदीप सेमवाल ने बताया कि यदि चित्रा गार्डन जैसे मिश्रित वन मॉडल को उत्तराखंड की एक हजार हेक्टेयर बंजर भूमि पर लागू किया जाए तो लगभग 24 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित भंडारण संभव है। यदि यही मॉडल राज्य की एक लाख हेक्टेयर बंजर भूमि पर विकसित किया जाए तो करीब 24 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस प्रकार की परियोजनाओं से कार्बन क्रेडिट के माध्यम से आर्थिक लाभ की भी व्यापक संभावनाएं हैं। शोधार्थी जयदेव चौहान ने बताया कि चित्रा गार्डन का तापमान श्रीनगर बाजार की तुलना में लगभग दो डिग्री सेल्सियस कम रहता है। इसके अलावा यहां पक्षियों तितलियों और मधुमक्खियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है जिससे क्षेत्र की जैव विविधता मजबूत हुई है। उन्होंने बताया कि अब तक 250 से अधिक किसानों और विद्यार्थियों को जैव विविधता संरक्षण औषधीय पौधों की उपयोगिता तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण संबंधी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का आकलन पेड़ों के व्यास (डायमीटर) और ऊंचाई के वैज्ञानिक मापन के आधार पर किया गया है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का मानना है कि चित्रा गार्डन मॉडल उत्तराखंड की अन्य बंजर भूमि को हरित क्षेत्र में बदलने के लिए प्रेरणास्रोत साबित हो सकता है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण जलवायु परिवर्तन नियंत्रण जैव विविधता संवर्धन और सतत विकास की दिशा में एक सफल उदाहरण बनकर सामने आई है।
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प्रदीप कुमार
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का बुघाणी रोड स्थित चित्रा गार्डन पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की दिशा में एक सफल मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है। विश्वविद्यालय की लगभग 3.5 हेक्टेयर बंजर भूमि को विकसित कर तैयार किए गए इस मिश्रित वन ने मात्र छह वर्षों में लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर उसे जैविक रूप से सुरक्षित (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन) किया है। यह उपलब्धि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विश्वविद्यालय के प्रयासों को नई पहचान दिला रही है। विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो.अन्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के निदेशक डॉ.विजय कांत पुरोहित तथा अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल के प्रयासों से इस परियोजना की शुरुआत की गई। वर्ष 2020 तक यह क्षेत्र पूरी तरह सूखी पथरीली और बंजर भूमि था लेकिन सुनियोजित वृक्षारोपण और वैज्ञानिक देखरेख के चलते आज यहां लगभग 2,500 पेड़ और 40 से अधिक प्रजातियों का समृद्ध मिश्रित वन विकसित हो चुका है। चित्रा गार्डन में जामुन शहतूत आंवला बेल बांज बांस सेब खुबानी सहित अनेक स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों का उच्च घनत्व वाले मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल के तहत रोपण किया गया है। इस मॉडल ने न केवल हरित क्षेत्र का विस्तार किया है बल्कि जैव विविधता संरक्षण और कार्बन अवशोषण की दृष्टि से भी उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। हैप्रेक के निदेशक डॉ.विजय कांत पुरोहित ने बताया कि हाल ही में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में चित्रा गार्डन में लगभग 23 टन कार्बन संग्रहित पाया गया है जो लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। उन्होंने बताया कि यह वन प्रतिवर्ष लगभग 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण से अवशोषित कर रहा है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है। वैज्ञानिक डॉ.राजीव वशिष्ठ ने बताया कि इस मिश्रित वन में कार्बन संग्रहण में शहतूत और जामुन की प्रजातियों का लगभग 58 प्रतिशत योगदान है। वहीं डेंकन और आंवला को शामिल करने पर चार प्रमुख प्रजातियां मिलकर लगभग 80 प्रतिशत कार्बन संग्रहण के लिए जिम्मेदार हैं। प्रति पौधा कार्बन अवशोषण क्षमता के आधार पर बांस और परिपक्व आंवला सबसे प्रभावी प्रजातियां पाई गई हैं। हैप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.सुदीप सेमवाल ने बताया कि यदि चित्रा गार्डन जैसे मिश्रित वन मॉडल को उत्तराखंड की एक हजार हेक्टेयर बंजर भूमि पर लागू किया जाए तो लगभग 24 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित भंडारण संभव है। यदि यही मॉडल राज्य की एक लाख हेक्टेयर बंजर भूमि पर विकसित किया जाए तो करीब 24 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस प्रकार की परियोजनाओं से कार्बन क्रेडिट के माध्यम से आर्थिक लाभ की भी व्यापक संभावनाएं हैं। शोधार्थी जयदेव चौहान ने बताया कि चित्रा गार्डन का तापमान श्रीनगर बाजार की तुलना में लगभग दो डिग्री सेल्सियस कम रहता है। इसके अलावा यहां पक्षियों तितलियों और मधुमक्खियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है जिससे क्षेत्र की जैव विविधता मजबूत हुई है। उन्होंने बताया कि अब तक 250 से अधिक किसानों और विद्यार्थियों को जैव विविधता संरक्षण औषधीय पौधों की उपयोगिता तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण संबंधी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का आकलन पेड़ों के व्यास (डायमीटर) और ऊंचाई के वैज्ञानिक मापन के आधार पर किया गया है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का मानना है कि चित्रा गार्डन मॉडल उत्तराखंड की अन्य बंजर भूमि को हरित क्षेत्र में बदलने के लिए प्रेरणास्रोत साबित हो सकता है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण जलवायु परिवर्तन नियंत्रण जैव विविधता संवर्धन और सतत विकास की दिशा में एक सफल उदाहरण बनकर सामने आई है।