प्रदीप कुमार
देहरादून/श्रीनगर गढ़वाल। राजधानी देहरादून में आयोजित सरस फूड फेस्टिवल 2026 ग्रामीण महिलाओं की आजीविका और स्वरोजगार का सशक्त मंच बनकर उभरा। सात दिवसीय इस आयोजन में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने कुल एक करोड़ एक लाख 692 रुपये का कारोबार किया। फेस्टिवल में 200 से अधिक स्टॉल लगाए गए। इनमें उत्तराखंड के सभी 13 जनपदों के साथ देश के 17 राज्यों के स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने प्रतिभाग किया। महिलाओं को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री के लिए बेहतर अवसर मिला। वहीं स्थानीय कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समां बांधा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेशभर में आयोजित किए जा रहे सरस फूड फेस्टिवल जैसे आयोजनों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार और आय अर्जित करने के नए अवसर मिल रहे हैं। इन मेलों में महिलाएं अपने पारंपरिक व्यंजनों पहाड़ी उत्पादों हस्तशिल्प और स्थानीय वस्तुओं का प्रदर्शन करने के साथ उनकी बिक्री भी कर रही हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलने के साथ उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार में पहचान दिलाने का अवसर मिल रहा है। सरस फूड फेस्टिवल में देश के विभिन्न राज्यों से आए स्वयं सहायता समूहों की सहभागिता भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। विभिन्न राज्यों के पारंपरिक उत्पादों व्यंजनों और हस्तशिल्प ने लोगों को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया। इस तरह के आयोजन ग्रामीण महिलाओं के हुनर को पहचान दिलाने के साथ उन्हें बाजार की संभावनाओं से जोड़ने में भी सहायक बन रहे हैं। ग्रामीण आजीविका को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित इस फेस्टिवल ने महिला सशक्तीकरण और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान किया। सरस फूड फेस्टिवल की नोडल अधिकारी अनीता पंवार ने बताया कि ग्राम्य विकास विभाग और जिला प्रशासन देहरादून के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय फेस्टिवल ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी मंच साबित हुआ है। उन्होंने बताया कि मेले में 200 से अधिक स्टॉल लगाए गए थे। इसमें उत्तराखंड के 13 जनपदों के साथ देश के 17 राज्यों के स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने प्रतिभाग किया। अनीता पंवार के अनुसार आजीविका की दृष्टि से समूहों की महिलाओं ने सात दिवसीय मेले में कुल एक करोड़ एक लाख 692 रुपये का कारोबार किया। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं अब लखपति दीदी बनने के बाद सीधे करोड़पति दीदी बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यह उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, उद्यमशीलता और स्वरोजगार के प्रति बढ़ते रुझान को दर्शाती है।
